Friday, September 4, 2009


ये हैं समाजवाद के लड़ाके

कुछ दिन पहले की बात है। मुलायम सिंह यादव पत्रकार वार्ता के पहले पत्रकारों से हंसी मजाक कर रहे थे। बोलते-बोलते कह गये। ये मुख्यमंत्री तो मिलने का वक्त ही नहीं देतीं। कई बार कहा मिलना चाहता हूं। पर समय ही नहीं दिया। पत्रकार हंस पडें तो मुलायम थोड़ा झेंप से गये। पर मुलायम का ये कबूलनाम हकीकत है इस प्रदेश की राजनीति का जहां माया बनाम मुलायम संघर्ष में छल का भी प्रयोग हो रहा है, दल का भी प्रयोग हो रहा है और यदा कदा बल का भी। दरअसल ये जंग महज सियासी जंग नहीं है। आपको याद होगा। वो घटनाक्रम, जब एक तरफ प्रदेश भर के थानों में आनन-फानन मुलायम के खिलाफ मुकदमे दर्ज हो रहे थे तो दूसरी तरफ हैरान परेशान मुलायम वक्त रहते पहुंच जाना चाहते थे गाजियाबाद से दिल्ली। कहीं उनको गिरफ्तार ना कर लिया जाये। मायावती इस बार सत्ता संघर्ष में आई तो भी उनका नारा था कि सरकार बनते ही मुलायम को जेल भेजूंगी। हालांकि अब सत्ता पाने के बाद वो कहती हैं कि बदले की भावना से काम नहीं करती वर्ना मुलायम जेल में होते। पर सच्चाई ये है कि मुलायम बनाम माया के संघर्ष में पिस रहा है प्रदेश। मुलायम ने लखनऊ शहर को लोहियामय किया तो मायावती ने आते ही लखनऊ को कर डाला माया मय। अंबेडरकर के अलावा कांशीराम की तो मूर्तियां लगी हीं, खुद मुख्यमंत्री ने भी अपनी मूर्तियां लगवा डालीं।
मुलायम अभी से अगले चुनाव का नारा तैयार करे बैठे हैं। 'सरकार में आया तो गिरवा दूंगा मूर्तियां '। साफ है दोनों ही नेताओं की राजनीति रह गयी है एक दूसरे तक सीमित। दरअसल गेस्ट हाउस कांड के बाद से दोनों दलों के बीच की राजनीतिक लड़ाई बदल चुकी है वरदहस्त के संघर्ष में। और इस संघर्ष में सब कुछ इस्तेमाल हो रहा है। अपनी पिछली सरकार में मुलायम के सामने बीएसपी कहीं नजर नहीं आई। ना तो हाउस के अंदर न ही प्रदेश की सड़कों पर। मुलायम ने अपने अंदाज में सरकार चलाई। पर अब बारी है मायावती की। और मायावती भी जुटी हैं उसी अंदाज में।
नजीर के तौर पर मायावती सरकार ने अभी हाल में एक फैसला कर पुलिस की पूरी संरचना ही बदल डाली। जिलों की कमान नए आईपीएस अफसरों यानी की एसएसपी से छीन कर दे दी गयी डीआईजी यानी घिसे घिसाये ऐसे अधिकारियों को। अंदरखाने की मानें तो सरकार चाहती थी जिलों की कमान ऐसे अफसरों के हाथ में हो, जो सरकार का इशारा बखूबी समझ सकें। नए अधिकारियों के साथ दिक्कत ये थी कि वो सरकार के साथ वफादारी निभाना नहीं जानते थे। और इससे पहले तक ज्यादातर जिलों की इन नए खून वाले अधिकारियों के ही हाथ में थी। लिहाजा हो गया बदलाव।
विरोधियों की मानें ये सारी तैयारी चुनाव के मद्देनजर की जा रही है। प्रशासनिक स्तर पर चुनाव से पहले अभी और फेरबदल होने की खबरें आ रही है। सूत्रों की मानें तो अधिकारियों को समीक्षा बैठकों के बहाने उन्हें बुला कर ये बताया जा रहा है कि चुनाव आयोग तोप नहीं है। चुनाव के बाद भी सरकार रहेगी और फिर देखेगी किसने क्या किया।
राजनैतिक स्तर पर भी चुन-चुन कर चोट पहुंचाने पर आमादा है बीएसपी। मानो मुलायम से एक-एक पल का बदला लेने पर आमादा हो। जिन बाहुबलियों के सहारे मुलायम कभी लाव लश्कर लिये घूमा करते थे, वो आज हाथी पर सवारी कर रहे हैं। मायावती ने चुन-चुन कर मुख्तार, अफजाल, अतीक, अन्ना शुक्ला, हरिशंकर तिवारी जैसे बाहुबलियों को तो मुलायम से अलग किया ही, उन्हें सोशल इंजीनियरिंग का कार्यकर्ता भी बना डाला। मुलायम जिन बाहुबलियों को कभी कानून का सताया सोशलिस्ट बताते थे अब उन्हीं को अपराधी साबित करने में जुटे हैं। ये वही मुलायम थे जिनके जमाने में शैलेंद्र सिंह जैसे ईमानदार डिप्टी एसपी को मुख्तार के चलते नौकरी तक छोड़नी पड़ी थी। अब मुलायम का समूचा कुनबा जुटा है मुख्तार को डॉन बताने में। प्रदेश का दुर्भाग्य यही है। एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये पार्टियों को इन बाहुबलियों की दरकार है और इसी का फायदा उठाते आ रहे हैं ये बाहुबली। जिसकी सत्ता उसके नौरत्न। फिर आम आदमी की फिक्र किसे है।
मायावती जी की मानें तो इन सारे बाहुबलियों को पार्टी में शामिल कर उन्होंने सुधरने का मौका दिया है। सवाल ये है कि क्या शरीफों की कमी है देश और प्रदेश में। कि बहन जी को सहारा लेना पड़ रहा है इन बिगड़े हुओं का.... बात साफ है। मुलायम हो, चाहे मायावती या फिर लालू और पासवान जैसे लोग। इनकी लड़ाई तो शुरू हुई समाजवाद के नाम पर, समतामूलक समाज के नाम पर, बराबरी का हक दिलाने के नाम पर... लेकिन अब अपने अपने स्वार्थ और सियासी फायदे के लिये आपस में ही भिड़े पड़े हैं सब.. बेचारा समाजवाद तो दूर पड़ा है धूल में, कीचड़ में, किसी गरीब की कोठरी में...

एनकाउंटर पर ये कैसा शोर

लंबे समय से सोच रहा हूं, लिखना भी चाहता था। पर लगता था कि न लिखूं तो ही ठीक है। हो सकता है किसी को मेरी बातें ठीक ना लगें। पर आज खबर लगी कि एक बार फिर एक शहीद की शहादत पर उठाये जा रहे हैं सवाल। एक बार पहुंचाई जा रही है किसी शहीद के परिवार को पीड़ा। लिहाजा खुद को रोक ना पाया और आ गया आप सबके बीच। मसला है शहीद इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा का....मसला है उस एनकाउंटर का जिसको लेकर हो रही है सियासत। बीते साल दिल्ली में हुई आतंकी वारदात के तुरंत बाद हुआ ये था बाटला एनकांउटर। तमाम संगठन, सियासी दल अब इस एनकाउंटर के खिलाफ लंबी लड़ाई का बिगुल फूंक रहे हैं। ऐसे में इंतजार था कि कहीं से कोई आवाज तो उठेगी पर अफसोस। अबसे कुछ रोज पहले ही हम सब जिसकी शहादत को सलाम करते रहे उसके लिये पूरे देश से कोई आवाज नहीं उठी, किसी भी संगठन ने नेताओं से ये कहने की हिम्मत नहीं जुटाई कि सब कुछ कबूल है पर शहीदों की शहादत का अपमान नहीं। कहना क्या चाहते हैं। मोहन चंद्र शर्मा ने क्या खुद को गोली मार ली या फिर उनके दोस्तों ने उन्हें गोली का निशाना बना लिया।
वो जांबाज इंस्पेक्टर जिसने मौत से जूझते हुए अपने बच्चे की परवाह किये बिना अपनी जान दांव पर लगा दी, आज उसकी शहादत पर सियासत हो रही है। मुझे तो शर्म आती है। उन तथाकथित बुद्धिजीवियों से पूछिये जो बाटला हाउस एनकाउंटर के महज 48 घंटे बाद ही इस नतीजे पर जा पहुंचे कि एनकाउंटर फर्जी है। आखिर कौन सा आधुनिक संयंत्र था उनके पास जिसने ये रिपोर्ट दे डाली। तमाम मानवाधिकार के रहनुमा आंसू बहाते जा पहुंचे आजमगढ़।
मैम्सेसे पुरस्कार प्राप्त संदीप पाण्डेय जैसे लोगों ने भी इस मोर्चे की अगुआई की। हैरानी होती है। तमाम संसाधनों से लैस पुलिस और खोजी मीडिया इस एनकाउंटर की हकीकत नहीं ढूंढने का दावा नहीं कर पाई पर ये बुद्धजीवी महज 48 घंटे में जा पहुंचे नतीजे पर। दुख होता है कहते हुए पर सही बात तो ये है कि मोहन चंद्र शर्मा की शहादत ने कम से कम इस एनकाउंटर को जायज ठहरा दिया वर्ना राजनीति के इस दौर में कोई बड़ी बात नहीं कि जिंदा रहते हुए खुद मोहन चंद्र शर्मा और उनकी टीम कटघरे में खड़ी होती। और उनके खिलाफ आवाज बुलंद हो रही होती।
शहादत ने कम से कम ये बात तो साबित ही कर दी कि एनकाउंटर में सामने से गोलियां भी चलीं। हम हिंदुस्तानी उम्मीद करते हैं कि कोई जवान अपनी जान हथेली पर रख कर हमारी हिफाजत करेगा पर एक शहीद की शहादत का मजाक उड़ाने वालों के खिलाफ आगे नहीं आते। एसी कमरे में बैठ कर खबर देखते हैं और भूल जाते हैं कि इस खबर का ताल्लुक उस शख्स से है जिसने देश की हिफाजत के लिये कुर्बानी दी। तभी तो चल रही है नेताओं की सियासत।
वोट बैंक सधे, इसके लिये कुछ भी बोलने से परहेज नहीं क्योंकि उन्हें पता है कि आम हिंदुस्तानी की कोई आवाज नहीं। वो सिर्फ सुनना जानता है। क्या किसी भी बुद्धिजीवी, समाजसेवी या मानविधकार के रहनुमा ने मोहन चंद्र शर्मा के घर की हालत जानने की कोशिश की। क्या किसी मानवाधिकार संगठन ने उनके बूढ़े पिता, उनकी पत्नी और मासूम बच्चों की आवाज उठाई। छोड़िये। कौन सा मानवाधिकार संगठन है जो आतंकी हमलों में मारे गये लोगों के परिवार वालों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहा है। कौन सा बुद्धजीवी है जो हमलों में मारे गये बेकसूरों के परिवार वालों का सहारा बन रहा है। सारा मानवाधिकार आतंक फैलाने वाले देशद्रोहियों के लिये ही।
अफसोस है मोहन चंद्र शर्मा के घर तो बुद्धजीवी नहीं पहुंचे पर मारे गये आतंकी के घर मरहम का फाहा लगाने पूरी की पूरी फौज जुट आई। मैं एनकाउंटर में मारे गये या फिर पकड़े गये आतंकियों को सौ फीसदी दावे के साथ गुनाहगार कहने को तैयार नहीं, पर कम से कम अदालत के फैसले का इंतजार तो कर लिजिये। कम से कम तब तक तो किसी शहीद की शहादत का मजाक ना उड़ाइये। अगर यकीन है अदालत जैसी संस्था पर। अगर यकीन है देश के कानून पर।
पर कौन बोले। शायद यही वजह है जिसके चलते अब नौजवान भगत सिंह नहीं बनना चाहते। कोई, वीर अब्दुल हमीद की तरह जान नहीं देना चाहता। लोग चाहते हैं कि भगत सिंह पैदा हों पर मेरे घर नहीं, पड़ोसी के घर। क्योंकि पता है शहीदों की शहादत पर सवाल खड़े करने की परंपरा चल पड़ी है। आज के दौर में भगत सिंह या वीर अब्दुल हमीद भी होते तो किसी ना किसी अमर सिंह का बयान सस्ती लोकप्रियता की वजह जरूर बन जाता है।
पर शहीदों की शहादत पर सवाल उठाना ही अब शायद बुद्धजीवी कहलाने की पहचान बन गयी है। लोग चौंक कर सुनते तो हैं। अंत में भरे मन से शहीद मोहन चंद्र शर्मा को श्रद्धांजलि। अगर मेरी आवाज उनके परिवार के लोगों तक पहुंच सकती है तो कहना चाहूंगा कि एक हिंदुस्तानी होने के नाते उनके साथ था, उनके साथ हूं और उनके साथ रहूंगा भी। फिर भले ही किसी को मेरी ये बात बुरी क्यूं ना लगे.........जय हिंद।