Friday, September 4, 2009


एनकाउंटर पर ये कैसा शोर

लंबे समय से सोच रहा हूं, लिखना भी चाहता था। पर लगता था कि न लिखूं तो ही ठीक है। हो सकता है किसी को मेरी बातें ठीक ना लगें। पर आज खबर लगी कि एक बार फिर एक शहीद की शहादत पर उठाये जा रहे हैं सवाल। एक बार पहुंचाई जा रही है किसी शहीद के परिवार को पीड़ा। लिहाजा खुद को रोक ना पाया और आ गया आप सबके बीच। मसला है शहीद इंसपेक्टर मोहन चंद्र शर्मा का....मसला है उस एनकाउंटर का जिसको लेकर हो रही है सियासत। बीते साल दिल्ली में हुई आतंकी वारदात के तुरंत बाद हुआ ये था बाटला एनकांउटर। तमाम संगठन, सियासी दल अब इस एनकाउंटर के खिलाफ लंबी लड़ाई का बिगुल फूंक रहे हैं। ऐसे में इंतजार था कि कहीं से कोई आवाज तो उठेगी पर अफसोस। अबसे कुछ रोज पहले ही हम सब जिसकी शहादत को सलाम करते रहे उसके लिये पूरे देश से कोई आवाज नहीं उठी, किसी भी संगठन ने नेताओं से ये कहने की हिम्मत नहीं जुटाई कि सब कुछ कबूल है पर शहीदों की शहादत का अपमान नहीं। कहना क्या चाहते हैं। मोहन चंद्र शर्मा ने क्या खुद को गोली मार ली या फिर उनके दोस्तों ने उन्हें गोली का निशाना बना लिया।
वो जांबाज इंस्पेक्टर जिसने मौत से जूझते हुए अपने बच्चे की परवाह किये बिना अपनी जान दांव पर लगा दी, आज उसकी शहादत पर सियासत हो रही है। मुझे तो शर्म आती है। उन तथाकथित बुद्धिजीवियों से पूछिये जो बाटला हाउस एनकाउंटर के महज 48 घंटे बाद ही इस नतीजे पर जा पहुंचे कि एनकाउंटर फर्जी है। आखिर कौन सा आधुनिक संयंत्र था उनके पास जिसने ये रिपोर्ट दे डाली। तमाम मानवाधिकार के रहनुमा आंसू बहाते जा पहुंचे आजमगढ़।
मैम्सेसे पुरस्कार प्राप्त संदीप पाण्डेय जैसे लोगों ने भी इस मोर्चे की अगुआई की। हैरानी होती है। तमाम संसाधनों से लैस पुलिस और खोजी मीडिया इस एनकाउंटर की हकीकत नहीं ढूंढने का दावा नहीं कर पाई पर ये बुद्धजीवी महज 48 घंटे में जा पहुंचे नतीजे पर। दुख होता है कहते हुए पर सही बात तो ये है कि मोहन चंद्र शर्मा की शहादत ने कम से कम इस एनकाउंटर को जायज ठहरा दिया वर्ना राजनीति के इस दौर में कोई बड़ी बात नहीं कि जिंदा रहते हुए खुद मोहन चंद्र शर्मा और उनकी टीम कटघरे में खड़ी होती। और उनके खिलाफ आवाज बुलंद हो रही होती।
शहादत ने कम से कम ये बात तो साबित ही कर दी कि एनकाउंटर में सामने से गोलियां भी चलीं। हम हिंदुस्तानी उम्मीद करते हैं कि कोई जवान अपनी जान हथेली पर रख कर हमारी हिफाजत करेगा पर एक शहीद की शहादत का मजाक उड़ाने वालों के खिलाफ आगे नहीं आते। एसी कमरे में बैठ कर खबर देखते हैं और भूल जाते हैं कि इस खबर का ताल्लुक उस शख्स से है जिसने देश की हिफाजत के लिये कुर्बानी दी। तभी तो चल रही है नेताओं की सियासत।
वोट बैंक सधे, इसके लिये कुछ भी बोलने से परहेज नहीं क्योंकि उन्हें पता है कि आम हिंदुस्तानी की कोई आवाज नहीं। वो सिर्फ सुनना जानता है। क्या किसी भी बुद्धिजीवी, समाजसेवी या मानविधकार के रहनुमा ने मोहन चंद्र शर्मा के घर की हालत जानने की कोशिश की। क्या किसी मानवाधिकार संगठन ने उनके बूढ़े पिता, उनकी पत्नी और मासूम बच्चों की आवाज उठाई। छोड़िये। कौन सा मानवाधिकार संगठन है जो आतंकी हमलों में मारे गये लोगों के परिवार वालों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहा है। कौन सा बुद्धजीवी है जो हमलों में मारे गये बेकसूरों के परिवार वालों का सहारा बन रहा है। सारा मानवाधिकार आतंक फैलाने वाले देशद्रोहियों के लिये ही।
अफसोस है मोहन चंद्र शर्मा के घर तो बुद्धजीवी नहीं पहुंचे पर मारे गये आतंकी के घर मरहम का फाहा लगाने पूरी की पूरी फौज जुट आई। मैं एनकाउंटर में मारे गये या फिर पकड़े गये आतंकियों को सौ फीसदी दावे के साथ गुनाहगार कहने को तैयार नहीं, पर कम से कम अदालत के फैसले का इंतजार तो कर लिजिये। कम से कम तब तक तो किसी शहीद की शहादत का मजाक ना उड़ाइये। अगर यकीन है अदालत जैसी संस्था पर। अगर यकीन है देश के कानून पर।
पर कौन बोले। शायद यही वजह है जिसके चलते अब नौजवान भगत सिंह नहीं बनना चाहते। कोई, वीर अब्दुल हमीद की तरह जान नहीं देना चाहता। लोग चाहते हैं कि भगत सिंह पैदा हों पर मेरे घर नहीं, पड़ोसी के घर। क्योंकि पता है शहीदों की शहादत पर सवाल खड़े करने की परंपरा चल पड़ी है। आज के दौर में भगत सिंह या वीर अब्दुल हमीद भी होते तो किसी ना किसी अमर सिंह का बयान सस्ती लोकप्रियता की वजह जरूर बन जाता है।
पर शहीदों की शहादत पर सवाल उठाना ही अब शायद बुद्धजीवी कहलाने की पहचान बन गयी है। लोग चौंक कर सुनते तो हैं। अंत में भरे मन से शहीद मोहन चंद्र शर्मा को श्रद्धांजलि। अगर मेरी आवाज उनके परिवार के लोगों तक पहुंच सकती है तो कहना चाहूंगा कि एक हिंदुस्तानी होने के नाते उनके साथ था, उनके साथ हूं और उनके साथ रहूंगा भी। फिर भले ही किसी को मेरी ये बात बुरी क्यूं ना लगे.........जय हिंद।

1 comment:

  1. sir jo family extort hote hai unse puchiye jab criminal ki call ati hai to saham jate hai ese log police encounter mai mare jate hai to bura kya hai criminal or pistol ek se hote hai dono ka tut jana samaz ke haqe mai hota hai aap bawak likhe aap ke sachhe dil se jo nikala hai sach hai

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