Monday, October 2, 2017




आपने धूमधाम से जन्माष्टमी मनाई, पर यक़ीन मानिए, जन्माष्टमी का इससे बेहतर ज़श्न कहीं हो ही नहीं सकता, इन बच्चों के साथ, ये तस्वीरें हैं देवरिया के स्टेशन रोड के नारी निकेतन और बाल गृह केंद्र की, छोटे छोटे मासूम निराश्रित बच्चे, जिनमें अधिकांश को ये तक नहीं पता कि उनके माता -पिता कौन हैं, ये बच्चे नन्हीं सी उम्र में ही ज़िंदगी की तमाम दुश्वारियां झेल रहे हैं, ऐसे में माँ बाप की भूमिका निभा रही हैं श्रीमती गिरिजा त्रिपाठी जी और श्रीमती कंचन जी, इनकी लगन देख मुरीद हो गया, वे सिर्फ इन बच्चों की देखरेख का दायित्व ही नहीं निभा रहीं, बल्कि अपने बच्चों जैसा स्नेह भी दे रहीं हैं, यही बड़ी बात है, काफ़ी वक्त इन बच्चों के साथ गुज़ारा, उनका परफ़ॉर्मेंस भी देखा, ये महसूस हुआ कि अद्भुत प्रतिभा है इन बच्चों में, शायद यही ईश्वर की लीला है, संकट भी देते हैं तो संकट से लड़ने की ताक़त भी, यही ताक़त इन नन्हे मुन्नों में भी नज़र आई, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम अपनी ख़ुशियों के बीच थोड़ा भी इन बच्चों को दे पाएँ तो ये शायद सबसे बड़ी पूजा होगी, धन्यवाद 🙏

गांधी जी के 18 बंदर



ये हैं गांधी जी के 18 बंदर, चौंक गए ना, तो सुनिए, ये बंदर निकले हैं गोरखपुर से लखनऊ की कठिन साइकिल यात्रा पर, गांधी जी के तीन बंदरों की माफिक बच्चों के साथ बुरा मत करो- बुरा मत देखो और बुरा मत सुनो के संदेश के साथ, इनकी अगुवाई कर रहे हैं....

क्रांतिकारी साथी आजाद पांडेय, अष्टानंद पाठक और मंगेश झा, आज़ाद पांडेय जी रेलवे स्टेशन पर रहने वाले अनाथ बच्चों के लिए माता पिता की भूमिका निभाते हैं, अपने बच्चों की तरह उनकी सेवा करते हैं, कई बार ख़ुद भूखे रह कर भी उनका पेट भरने के लिये स्माइल रोटी बैंक चलाते हैं, और कलयुग के राक्षसों से बच्चे-बच्चियों की हिफाजत की लड़ाई भी लड़ते हैं, अष्टानंद पाठक जी सिविल सेवा में सफल होकर मुक़ाम पा चुके हैं, तमाम प्रतियेगी छात्रों के रोल माडल हैं, उनके पास गाड़ी है बंगला है, पर अनाथ ग़रीब बच्चों को उनका हक़ दिलाने के लिए उमस और गर्मी में वे सब कुछ छोड़कर साइकिल यात्रा पर हैं, मंगेश झा प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के बाद बड़े होटलों का मैनेजमेंट संभालते थे, पर एक बार झारखंड के जंगलों में जाकर आदिवासी परिवारों की व्यथा देखी तो लाखों का पैकेज छोड़ सामाजिक मैनेजमेंट संभालने उतर पड़े, ऐसे वक्त में तब जबकि बापू, शास्त्री जी, बाबा साहब और दीनदयाल जी जैसे महापुरूषों के विचार तमाम लोगों के लिये महज़ किताबों और भाषणों की बात बन कर रह गए हैं तब ये दीवाने सुख चैन छोड़ कर कुछ कर गुज़रने के लिये निकल पड़े हैं, शोर शराबे से दूर, मीडिया की सुर्खियों से इतर, सीआरपीएफ़ के असिस्टेंट कमांडेट सर्वेश एक मिलिट्री आपरेशन में जख्मी होने के बाद भी इन साइकिल यात्रियों का बराबर साथ दे रहे हैं, बहादुर और छोटी बहन शुभांगी भी इन साइकिल यात्रियों में शामिल हैं..

 सौभाग्यशाली हूँ कि गोरखपुर में इस साइकिल यात्रा को शुरू कराने के अभियान का हिस्सा बना, यात्रा तीन अक्टूबर को लखनऊ पहुँचेगी, नकारात्मकता के माहौल में एक सकारात्मक लक्ष्य के साथ निकले इन नौजवानों को हृदय से शुभकामनाएँ, आप सभी को भी हृदय से साधुवाद, बापू और शास्त्री जी की जयंती पर इससे बड़ी श्रद्धांजलि भला और क्या हो सकती है, मेरा मानना है कि हम सबको भी इस ईमानदार प्रयास का छोटा सा ही सही, पर एक हिस्सा ज़रूर बनना चाहिए मासूम बच्चों और बचपन को बचाने का, जय हिंद- जय भारत 🙏